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Thursday 19th of October 2017
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अबुस सना आलूसी

{ وَإِذْ قُلْنَا لَكَ إِنَّ رَبَّكَ أَحَاطَ بِالنَّاسِ وَمَا جَعَلْنَا الرُّؤيَا الَّتِي أَرَيْنَاكَ إِلاَّ فِتْنَةً لِّلنَّاسِ وَالشَّجَرَةَ الْمَلْعُونَةَ فِي القُرْآنِ وَنُخَوِّفُهُمْ فَمَا يَزِيدُهُمْ إِلاَّ طُغْيَانًا كَبِيرًا }


मज़कूरा आयत की तफ़सीर में इब्ने जरीर से, वह सहल बिन साद से, वह इब्ने अबी हातम और इब्ने मरदुवा से, और अद दयायल में बैहक़ी व इब्ने असाकर से, वह सईद बिन मुसय्यब से, और रिवायते इब्ने अबी हातम याली बिन मर्रा से, और वह इब्ने उमर से पैग़म्बरे अकरम (स) के ख़्वाब के बारे में रिवायत करते हैं कि रसूले अकरम (स) ने ख़्वाब देखा कि बनी उमय्या मेरे मिम्बर पर बंदर की तरह चढ़ रहे हैं। आपको यह ख़्वाब ना गवार लगा और उसी मौक़े पर ख़ुदा वंदे आलम ने मज़कूरा आयत नाज़िल फ़रमाई..।

तर्जुमा, जैसे आपने देखा है वह हमने इसलिये दिखाया है कि वह लोगों के दरमियान फ़ितना हैं और क़ुरआने मजीद में वह शजर ए मलऊना है और हम लोगों को डराते रहते हैं लेकिन उनकी सरकशी बढ़ती हा जा रही है।

तफ़सीरे आलूसी मज़कूरा आयत के ज़ैल में

डाक्टर ताहा हुसैन मिस्री

मौसूफ़ अपनी किताब मिरातुल इस्लाम में कहते हैं: ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में मक्के की अज़मत बयान की है और मदीने को पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़रिये मोहतरम क़रार दिया लेकिन बनी उमय्या ने मक्के और मदीने को मुबाह कर दिया। यज़ीद बिन मुआविया के जम़ाने में शुरु हुआ जिसने मदीने को तीन बार मुबाह और ताराज किया है। अब्दुल मलिक बिन मरवान ने भी मक्के को मुबाह करने की इजाज़त हुज्जाज बिन युसुफ़ को दी और क्या क्या ज़ुल्म व सितम वहाँ अंजाम न दिये?। और यह सब इसलिये था कि शहरे मुक़द्दस (के रहने वाले) अबू सुफ़यान और बनी मरवान की औलाद के सामने झुके रहे, इब्ने ज़ियाद ने यज़ीद बिन मुआविया के हुक्म से (इमाम) हुसैन (अ) और आपके बेटों और भाईयों को क़त्ल किया और रसूलल्लाह (स) की बेटियों को असीर कर लिया... मुसलमानों का माल ख़ुलाफ़ा की ज़ाती मिल्कियत बन कर रह गया और जिस तरह चाहा उसको ख़र्च किया, न जिस तरह से ख़ुदा वंदे आलम चाहता था...। ()

नीज़ मौसूफ़ का बयान है: तुग़यान व सरकशी मशरिक़ व मग़रिब तक फैल गई, ज़ियाद उसकी औलाद ज़मीन पर फ़साद रहे थे ता कि बनी उमय्या की हुकूमत बरक़रार रह सके और बनी उमय्या ने उनके लिये उन फ़सादात को मुबाह कर दिया था और हुज्जाज ज़ियाद व इब्ने ज़ियाद के बाद इराक़ में वारिद हुआ जिसने इराक़ को शर व फ़साद और बुराईयों से भर दिया।

() मरअतुल इस्लाम पेज 268, 270

() मरअतुल इस्लाम पेज 268, 272

इसी तरह मौसूफ़ अपनी किताब अल फ़ितनतुल कुबरा में रक़्म तराज़ है: अली (अ) रसूले अकरम (स) के सबसे करीबी शख़्स थे, वह आँ हज़रत (स) के तरबीयत याफ़्ता और आपकी अमानतों को वापस करने में जानशीन थे वह पैग़म्बरे इस्लाम (स) के अक़्दे उख़ूवत की बिना पर आँ हज़रत (स) के भाई थे, वह दामादे पैग़म्बर और रसूले ख़ुदा (स) की ज़ुर्रियत के बाप थे, वह पैग़म्बरे अकरम (स) के अलमदार और आपके अहले बैत के दरमियान थे और हदीसे नबवी के मुताबिक़ रसूले अकरम (स) के नज़दीक आपका मर्तबा जनाबे मूसा के नज़दीक हारुन के मर्तबे की तरह था। अगर तमाम मुसलमान यही सब कुछ कहते औऱ उन्ही मतालिब की वजह से अली (अ) का इंतेख़ाब करते तो कभी भी हक़ से दूर न होते और मुनहरिफ़ न होते।

यह सब चीजें हज़रत अली (अ) की ख़िलाफ़त की निशानियाँ थीं, आपकी रसूले अकरम (स) से रिश्तेदारी, इस्लाम में सबक़त, मुसलमानो के दरमियान अज़मत, जिहाद और जंग में मसायब का बर्दाश्त करना और ऐसी सीरत जिसमें किसी तरह का कोई इंहेराफ़ और कजी नही थी। दीन व फ़क़ाहत में शिद्दत और किताब व सुन्नत का इल्म और राय में इसतेहकाम वग़ैरह वग़ैरह, तमाम सिफ़ात आपका रास्ता हमवार करने वाली थीं, बनी हाशिम को ख़िलाफ़त से बिल्कुल दूर रखा गया, क़ुरैश ने उनके साथ यह सुलूक किया क्योकि वह इस बात से ख़ौफ़ज़दा थे कि बनी हाशिम के पास एक जमाअत जमा हो जायेगी वह नही चाहते थे कि ख़िलाफ़त उनके क़बीले के अलावा किसी दूसरे कबीले में जाये।

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: "मुआविया के बारे में जो कुछ भी लोग कहें लेकिन वह अबू सुफ़यान का बेटा है जो जंगे ओहद व ख़ंदक़ में मुशरेकीन का सरदार था, वह हिन्दा का बेटा है जो हमज़ा के क़त्ल का बाइस बनी और उनके शिकम को चाक करके जीगर को निकाला, चुँनाचे पैग़म्बरे अकरम (स) के नज़दीक यह एक ऐसा हादेसा था जिसको देख कर गोया आपकी जान निकली जा रही हो....।" ()

() अल फ़ितनतुल कुबरा जिल्द 1 पेज 152

() अल फ़ितनतुल कुबरा जिल्द 2 पेज 15



मशहूर मुवर्रिख़ सैयद अमीर अली हिन्दी

मौसूफ़ कहते हैं: हुकूमते बनी उमय्या ने सिर्फ़ ख़िलाफ़त के उसूल और उसकी तालिमात ही को नही बदला बल्कि उनकी हुकूमत ने इस्लाम की बुनियादों को पलट कर रख दिया।

मौसूफ़ एक दूसरी जगह कहते हैं: जब शाम में मुआविया ने ख़िलाफ़त पर क़ब्ज़ा कर लिया तो उसकी हुकूमत गुज़िश्ता बुत परस्ती की तरफ़ पलट गई और उसने इस्लामी डेमोक्रेसी की जगह ले ली....।

एक और जगह मौसूफ़ तहरीर करते हैं: इस तरह मक्के की बुत परस्ती वापस लौट आई और उसने शाम में सर निकाला। ()

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: बनी उमय्या में उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ के अलावा सब बुत परस्त थे वह लोग अहकामें शरीयत की रिआयत न करने और अरकाने दीन को मुनहदिम करने पर फ़ख़र व मुबाहात किया करते थे, वही दीन जिसका इक़रार करते थे... उन्होने ख़िलाफ़त की कुर्सी को बहुत से जरायम से मुलव्विस किया और ख़ून के दरिया में ग़ोता दिया...। ()

() मुख़तसर तारिख़िल अरब वत तमद्दुनिल इस्लामी पेज 63

() रुहुल इस्लाम पेज 296

() रुहुल इस्लाम पेज 300

() रुहुल इस्लाम पेज 301



डाक्टर अहमद अमीन मिस्री

मौसूफ़ अपनी किताब ज़ुहल इस्लाम में तहरीर करते हैं: ख़िलाफ़त के सिलसिले में अहले सुन्नत का नज़रियी मुताआदिल तर, मुसतहकम तर और अक़्ल के नज़दीक तर है अगरचे उनसे इस सिलसिले में बाज़ पुर्स होना चाहिये कि उन्होने अपने नज़रिये को मुसतहकम और अच्छी तरह अमली नही किया है, उन्होने अपने आईम्मा की वाज़ेह तौर पर तंक़ीद नही की है और जब उन्होने ज़ुल्म किया तो उनके मुक़ाबले में खड़े नही हुए और जब उन्होने ज़ुल्म किया तो वह उनको राहे मुस्तक़ीम पर नही लाये और उन्होने ऐसे कवानीन नही बनाये जो ख़लीफ़ो को उम्मत पर ज़ुल्म करने से रोक सकें बल्कि उनके मुक़ाबले में सरे तसलीम ख़म किये रखा जो वाक़ेयन नागवार था, इसी वजह से उन्होने उम्मत पर बहुत ज़ुल्म किया है। ()

वह अपनी दूसरी किताब यौमुल इस्लाम में तहरीर करते हैं: रसूले इस्लाम (स) ने उस बीमारी में जिसमें आपने रेहलत फ़रमाई, यह इरादा किया कि अपने बाद के लिये मुसलमानों का वली ए अम्र मुअय्यन कर दें जैसा कि बुख़ारी और सही मुस्लिम में रिवायत है कि आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: लाओ तुम्हारे लिये एक ऐसा ख़त लिख दूँ जिससे मेरे बाद गुमराह न हों... लेकिन उन लोगों ने ख़िलाफ़त की मेहार को अपनी मर्ज़ी के मुताबिक़ अपने हाथों में ले लिया, इसी वजह से ख़िलाफत के सिलसिले में आज तक इख़्तिलाफ़ बाक़ी है। रसूले अकरम (स) के जम़ाने में इस्लाम मुसतहकम और मतीन था लेकिन जब आँ हज़रत (स) की रेहलत हुई तो ख़तरनाक जंगें शुरु हो गयीं। ()

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: इख़्तिलाफ़ का एक मिसदाक़ वह इख़्तिलाफ़ था जो रसूले अकरम (स) के बाद ख़िलाफ़त के सिलसिले में हुआ और यह चीज़ ख़ुद उन लोगों की कमज़ोरी की निशानी है क्योकि रसूले अकरम (स) ने दफ़्न होने से पहले ही इख़्तिलाफ़ शुरु कर दिये....। ()

मौसूफ़ अपनी एक किताब और किताब फजरे इस्लाम (स) में तहरीर करते हैं: जब बनी उमय्या ने ख़िलाफ़त को अपने हाथों में ले लिया तो फिर तअस्सुब ज़मान ए जाहिलियत की तरह अपनी पुरानी हालत पर पलट गया। ()

() ज़ुहल इस्लाम जिल्द 3 पेज 225

() यौमुल इस्लाम पेज 41

() यौमुल इस्लाम पेज 53

() फ़जरुल इस्लाम पेज 79

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: ख़लिफ़ ए दमिश्क़ (मुआविया) का कनीज़ों के गानों और लह व लअब को साज़ व सामान से भरे हुए थे। वह अलल ऐलान और मख़्फ़ी तौर पर गुनाह करता था और लोगों के दरमियान फ़हशा व मुन्कर को रायज करता था...। ()

नीज़ मौसूफ़ एक दूसरी तरह तहरीर करते हैं: अबू सुफ़यान ने अपने कुफ़्र आमेज़ अक़ीदे का इज़हार उस वक़्त किया कि जब उस्मान बिन अफ़्फ़ान हुकूमत पर पहुचे, चुँनाचे उसने कहा: तीम व अदी के बाद हुकूमत तुम तक पहुची है लिहाज़ा इसको गेंद की तरह एक दूसरे हाथ में देते रहो और उसके अरकान में बनी उमय्या को क़रार दो, क्योकि ख़िलाफ़त, मुल्क और हुकूमत है और मैं नही जानता था कि जन्नत व जहन्नम है भी या नही? () और अगरचे उस्मान ने उनको दूर रखा लेकिन कुछ मुद्दत में उस काफ़िर घराने की रस्सी का जाल ख़िलाफ़त पर आ गिरा और जब उस घराने में हुकूमत आई तो उनके ज़हरीले आसार अकसर औक़ात ज़ाहिर होते रहे हैं। ()

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: मैं मुआविया को इस बात से बरी नही करूँगा कि उसने (इमाम) हसन (अ) को ज़हर दिया, क्योकि यह शख़्स हरगिज़ पक्का मुसलमान नही था बल्कि यूँ कहा जाये तो बेहतर है कि यह एक ऐसा जाहिल था जो अपने बेटे के लिये हर गुनाह और जुर्म अंजाम देने के लिये तैयार था। यह शख़्स फ़तहे मक्का के वक़्त आज़ाद हुआ था लेकिन उसने अपनी ज़िन्दगी में बड़े बड़े सहाबा जैसे हज्र बिन अदी और उनके साथियों को दर्दनाक तरीक़े से क़त्ल किया और लोगों से अपने बेटे यज़ीद की बैअत के लिये न जाने क्या क्या कारनामे अंजाम दिये, लिहाज़ा ख़िलाफ़त जाहिलियत की बादशाही में बदल गई, जिसको आले मुआविया एक के बाद दूसरे की तरफ़ मुन्तक़िल करते रहे। ()

() नशअतुल फ़िक्रिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम जिल्द 1 पेज 229

() अन नज़ाअ वन तख़ासुम पेज 31

() नशअतुल फ़िक्रिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम जिल्द 1 पेज 198

() नशअतुल फ़िक्रिल फ़लसफ़ी फ़िल इस्लाम जिल्द 2 पेज 46



11. अब्बास महमूद अक़्क़ाद

मौसूफ़ अपनी किताब मुआविया फ़िल मीज़ान में तहरीर करते हैं: ख़िलाफ़त के ज़माने के बाद बनी उमय्या की हुकूमत का क़ायम होना तारीख़े इस्लाम और तारिख़े बशरी का सबसे ख़तरनाक हादेसा था। ()

() मुआविया फ़िल मीज़ान जिल्द 3 पेज 542

तबरी, सईद बिन सवीद से एक मदरक व सनद के साथ रिवायत करते हैं कि मुआविया ने लोगों से ख़िताब करते हुए कहा: मैंने तुम्हारे साथ इस वजह से जंग नही की है कि तुम रोज़ा रखो, नमाज़ पढ़ो, हज करो और ज़कात दो, क्योकि मैं जानता हूँ कि यह आमाल तो तुम अंजाम देते ही रहते हो, मैंने तुम से सिर्फ़ वजह से जंग की है कि मैं तुम्हारा अमीर हो जाऊँ। ()

डाक्टर महमूद ख़ालिदी, प्रोफ़ेसर यरमूक युनिवर्सिटी (जार्डन)

मौसूफ़ तहरीर करते हैं: रसूले अकरम (स) की वफ़ात के बाद निज़ामे ख़िलाफ़त एक नये अंदाज़ में ज़ाहिर हुआ... और उसमें बाबे इज्तेहाद खुल गया, ख़िलाफ़त के ऊपर आम लोगों के दरमियान बहस व जदल और इज्तेहाद का बाज़ार गर्म हो गया और इस सिलसिले में बहुत से नज़रियात पैदा हो गये। ख़िलाफ़त की शक्ल व सूरत और उसको इख़्तियार करने या जिस घर से ख़लीफ़ का इंतेख़ाब हो, उन तमाम चीज़ों के सिलसिले में मुख़्तलिफ़ राय और नज़रियात सामने आये और उस इख़्तिलाफ़ के नतीजे में ख़िलाफ़त की मुख़्तलिफ़ शक्लें सामने आयीं....। ()

क़ारिये मोहतरम, यह तमाम मुश्किलात और इख़्तिलाफ़ात नतीजा हैं अहले बैत और उनके सरे फ़ेहरिस्त हज़रत अली (अ) के मुतअल्लिक़ अहादिस के इंकार का।

() अल उसूलुल फ़िकरिया लिस सक़ाफ़तिल इस्लामिया जिल्द 3 पेज 16



मुस्तफ़ा राफ़ेई, पेरिस युनिवर्सिटी में हुक़ूक़ के माहिर

मौसूफ़ बनी उमय्या के ज़माने के सिलसिले में कहते हैं: तुम्हारे ज़माने में एक इंक़ेलाब आया बल्कि तुमने ख़िलाफ़त को निज़ामे हुकूमत के उनवान से देखा। ऐसी हुकूमत जो अपने पहले जौहर और दीनी अमल के उनवान से दूर हो गई है। इस ज़माने में ख़लीफ़ा अपने लिये महल बनाता था और तकिया लगाकर ख़िदमत गुज़ार रखता था.... उसी ज़माने में मुआविया ने नई सुन्नतों का इज़ाफ़ा किया और उनको अमली जामा पहनाने के लिये हर हीला व मक्कारी से काम लिया ताकि आम मुसलमान उस निज़ाम का पैरवी करें। ()

() मुस्तफ़ा राफ़ेई, अल इस्लाम निज़ामे इँसानी पेज 30



मुहम्मद रशीद रज़ा

मौसूफ़ अपनी तफ़सीर अलमनार में तहरीर करते हैं: किस तरह बनी उमय्या ने इस इस्लामी हुकूमत को गंदा कर दिया, उसके क़वायद व उसूल को पामाल कर दिया और मुसलमानों के लिये ज़ाती हुकूमत बना कर रख दिया, लिहाज़ा जिस शख़्स ने उस पर अमल किया और जो शख़्स रोज़े क़यामत तक उस पर अमल करेगा उसका गुनाह उन्ही की गर्दन पर है। ()

() तफ़सीरे अल मनार जिल्द 5 पेज 188

क़ारेईने केराम, यह तमाम मुश्किलात ख़लीफ़ ए मुसलेमीन की ख़िलाफ़त व इमामत पर इलाही हुक्म के इंकार करने की वजह पेश आई। अगर मुसलमान रसूले अकरम (स) के बाद होने वाले हक़ीक़ी आईम्मा के बारे में अहादीस का इंकार न करते तो फिर ऐसे मसायब व मुश्किलात में गिरफ़्तार न होते। यह ऐसी मुसीबतें हैं जिनका इक़रार ख़ुद अहले सुन्नत के उलामा ने किया है और वह उनके तौर व तरीक़े से शिकायत करते हैं लेकिन अहले बैत (अ) की पैरवी करने वाला शिया मुआशरा उन मुसीबतों में मुब्तला नही है।



जश्ने ग़दीर मुनअक़िद करना

मख़्सूस तारिख़ों और ख़ास हालातों में मुसलमानों के दरमियान अंजाम पाने वाले आमाल में से एक काम मख़्सूस दिनों में जश्न व महफ़िल मुनअक़िद करना है और यह काम इस रोज़ की अहमियत और अज़मत की वजह से होता है, चाहे रसूले अकरम (स) की बेसत का दिन हो या किसी इमाम की विलादत का दिन या कोई मख़्सूस मुनासेबत।

मुसलमान इन मुक़द्दस दिनों में मासूम (अ) से मानवी और रूहानी फ़ैज़ हासिल करने के लिये इस तरह की महाफ़िल मुनअक़िद करते हैं और उनके ज़रिये अज़ीम बरकतें हासिल करते हैं लेकिन अफ़सोस कि हमेशा से बह्हाबी लोग इन बरकतों से महरूम रहने के अलावा दूसरों को भी इस तरह की महफ़िल मुनअक़िद करने से रोकते हैं और इस तरीक़े से दुश्मनाने इस्लाम के मक़ासिद को पूरा करते हैं क्योकि दुश्मन कभी भी यह नही चाहता कि मुसलमान अपने मुक़द्देसात से दोबारा अहद व पैमान करते रहें। लिहाज़ा मौज़ू की अहमियत के पेशे नज़र इस सिलसिले में तहक़ीक़ करते हैं।

वह्हबियों के फ़तवे

इब्ने तैमिया का कहना है: दिनों की दूसरी क़िस्म वह दिन हैं जिनमें बाज़ वाक़ेयात रुनूमा हुए हैं जैसे 18 ज़िल हिज्जा और जैसा कि बाज़ लोग इस दिन ईद मनाते हैं जबकि कोई अस्ल और बुनियाद नही है, क्योकि असहाब और अहले बैत वग़ैरह ने इस दिन इस दिन को ईद क़रार नही दिया है, क्योकि ईज उस शरई हुक्म को कहा जाता है जिसकी पैरवी का हुक्म हुआ हो, न यह कि बिदअत ईजाद की जाये। यह काम ईसाईयों की तरह है जिन्होने हज़रत ईसा (अ) से मुताअल्लिक़ बाज़ वाक़ेयात के दिन ईद मनाना शुरु कर दिया। ()

शेख़ अब्दुल अज़ीज़ बिन बाज़ का कहना है: यह जायज़ नही है कि पैग़म्बर या किसी ग़ैर के लिये कोई महफ़िल मुनअक़िद की जाये और यह काम दीन में पैदा होने वाली बिदअतों में से है, क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) और ख़ुलाफ़ा ए राशेदीन नीज़ असहाब व ताबेईन ने ऐसा कोई काम अंजाम नही दिया है। ()

वहाबियत फ़तवा कमेटी के दायमी मिम्बरों का कहना है: यह जायज़ नही है कि अंबिया व सालेहीन के सोग में या उनके उनके रोज़े पैदाइश पर उनकी याद को ज़िन्दा करने के लिये महफ़िल व मजलिस मुनअक़िद की जाये और इसी तरह अलम उठाना और उनकी क़ब्रों पर शमा जलाना (भी जायज़ नही है) क्योकि यह तमाम चीज़ें दीन में ईजाद की गई बिदअतें और शिक्र है, पैग़म्बरे अकरम (स) गुज़श्ता अंबिया और सालेहीन ने इस तरह का कोई काम अंजाम नही दिया है। इस तरह शुरु की तीन सदियों में जो कि इस्लाम की बेहतरीन सदियाँ कहलाती हैं उनमें किसी सहाबी या मुसलमानों के इमाम ने यह अमल अँजान नही दिया है। ()

इब्ने फ़ौज़ान का कहना है: इस ज़माने में बहुत सी बिदअतें पैदा हो गई हैं जैसे माहे रबीउल अव्वल में पैग़म्बरे अकरम (स) की विलादत की मुनासेबत पर महफ़िल वग़ैरह मुनअक़िद करना। ()

इब्ने उसीमैन का कहना है: अपने बच्चो को रोज़े विलादत पर जश्न मनाना चूँकि दुश्मनाने ख़ुदा से मुशाबेहत रखता है और मुसलमानों के यहाँ यह काम नही होता था बल्कि ग़ैरों से हमारे यहाँ आया है, पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: जो शख़्स किसी (दूसरी) क़ौम के मुशाबेह होगा वह उसी क़ौम में श़ुमार किया जायेगा। ()

() इक़तेज़ाउल सिरातिल मुस्तक़ीम पेज 293, 295

() मजमू ए फ़तावा व मक़ालाते मुतनव्व

() अल लुजनतुल दायमा मिन फ़तवा रक़्म 1774

() अल बिदअत, इब्ने फ़ौज़ान पेज 25, 27

() फ़तावा मनारुल इस्लाम जिल्द 1 पेज 43

जश्ने मुनअक़िद करना मुहब्बत की निशानी है

मुहब्बत व दुश्मनी दो ऐसी चीज़े हैं जो इँसान के अँदर क़रार दी गयीं हैं जिसको इँसान की चाहत और नफ़रत से ताबीर किया जाता है।



वुजूबे मुहब्बत

अक़्ली और मंक़ूला दलीलों से मालूम होता है कि बाज़ हज़रात से मुहब्बत इंसान पर वाजिब है जैसे:



1. ख़ुदा वंदे आलम की मुहब्बत

ख़ुदा वंदे आलम उन हज़रात में सरे फ़ेररिस्त है जिनकी मुहब्बत उसूलन वाजिब है क्योकि ख़ुदा वंदे आलम तमाम सिफ़ात कमाल व जमाल का मज़हर है और तमाम मौजूदात उसी के मोहताज हैं लिहाज़ा ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाया:

आयत

() सूर ए तौबा आयत 24

पैग़म्बर, आप कह दीजिये कि अगर तुम्हारे बाप, दादा, औलाद, बिरादरान, अज़वाज, अशीरा व क़बीला और वह अमवाल जिन्हे तुमने जमा किया और वह तिजारत जिसके ख़सारे की तरफ़ से तुम फ़िक्र मंद रहते हो और वह मकानात जिन्हे पसंद करते हो, तुम्हारी निगाह में अल्लाह, उसके रसूल और राहे ख़ुदा में जिहाद से ज़्यादा महबूब हैं तो वक़्त का इंतेजार करो यहाँ तक कि अम्रे इलाही आ जाये और अल्लाह फ़ासिक़ क़ौम की हिदायत नही करता है।



2. रसूले अकरम (स) की मुहब्बत

ख़ुदा वंदे आलम की ख़ातिर रसूले अकरम (स) की मुहब्बत भी वाजिब है क्योकि आँ हज़रत (स) वास्ता ए फ़ैज़ हैं लिहाज़ा मज़कूरा आयत में ख़ुदा वंदे आलम के साथ आँ हज़रत (स) का भी ज़िक्र आया है और आपकी मुहब्बत का हुक्म हुआ है।

पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

हदीस

() मुसतदरके हाकिम जिल्द 3 पेज 149

ख़ुदा वंदे आलम से इस वजह से मुहब्बत करों कि वह तुम्हे रोज़ी देती है और मुझ से ख़ुदा की वजह से मुहब्बत करो।

आँ हज़रत (स) के फ़ज़ायल व मनाक़िब और कमालात भी उन असबाब में से हैं जिनकी वजह से इंसान उनकी तरफ़ मायल हो जाता है और आँ हज़रत (स) की मुहब्बत उसके दिल में पैदा हो जाती है।



3. अहले बैते पैग़म्बर (स)

जिन हज़रात की मुहब्बत वाजिब है उनमें से अहले बैते रसूले अकरम (स) भी हैं क्योकि उनके फ़ज़ायल व मनाक़िब और कमालात और वास्ता ए फ़ैज़ होने से कतए नज़र पैग़म्बरे अकरम (स) ने उनसे मुहब्बत का हुक्म दिया है, चुँनाचे गुज़श्ता हदीस (के ज़िम्न) में आँ हज़रत (स) इरशाद फ़रमाते हैं:

हदीस

() और मेरे अहले बैत से मेरी मुहब्बत की वजह से मुहब्बत रखो।



किन वुजूहात की बेना पर आले रसूल (स) से मुहब्बत की जाये?

चूँकि पैग़म्बरे अकरम (स) की मुहब्बत वाजिब है, दर्ज जै़ल वुजूहात की बेना पर आले रसूले (स) से भी मुहब्बत वाजिब व लाज़िम है:

1. इन हज़रात का रिश्ता साहिबे रिसालत हज़रत मुहम्मद (स) से है लिहाज़ा रसूले अकरम (स) ने फ़रमाया: रोज़े क़यामत के दिन हर नसब और सबब ख़त्म हो जायेगा सिवाए मेरे नसब और सबब के।

2. अहले बैत (अ) ख़ुदा और रसूल (स) के महबूब हैं जैसा कि हदीसे इल्म और हदीसे तैर में इस बात की तरफ़ इशारा हो चुका है।

3. अहले बैत (अ) की मुहब्बत, अजरे रिसालत है जैसा कि ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

आयत

() सूर ए शूरा आयत 23

आप कह दिजीये कि मैं तुम से इस तबलीग़ का कोई अजर नही चाहता सिवाए इसके कि मेरे क़राबत दारों से मुहब्बत करो

रोज़े क़यामत आले रसूले (स) की मुहब्बत के बारे में सवाल किया जायेगा (..) सिब्ते बिन जौज़ी ने मुजाहिद से यूँ नक़्ल किया है: क़यामत के दिन हज़रत अली (अ) की मुहब्बत के बारे में सवाल किया जायेगा। ()

() सूर ए साफ़ात आयत 24

() तज़किरतुल ख़वास पेज 10

आले रसूल और मासूमीन (अ), क़ुरआने मजीद के हम पल्ला हैं जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हदीस सक़लैन में इस चीज़ की तरफ़ इशारा किया है....हदीस

अहले बैत (अ) की मुहब्बत ईमान की शर्त है क्योकि शिया व सुन्नी किताबों में सही अहादीस बयान हुई हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से ख़िताब करते हु फ़रमाया: या अली, तुम्हे कोई दोस्त नही रखेगा मगर जो मोमिन होगा और तुम्हे कोई दुश्मन नही रखेगा मगर यह कि वह मुनाफ़िक़ होगा।

अहले बैत (अ) कश्ती ए निजात हैं जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया:

हदीस

मेरे अहले बैत की मिसाल कश्ती ए नूह जैसी है कि जो उसमे सवार हो गया वह निजात पा गया और जिसने रू गरदानी की वह ग़र्क़ हो गया।

अहले बैत (अ) की मुहब्बत, आमाल और इबादात क़बूल होने के लिये ज़रूरी है क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से फ़रमाया: अगर मेरी उम्मत इतने रोज़े रखे कि उनकी कमर झुक जाये और पेट अंदर चले जायें और इतनी नमाज़ पढ़े कि रस्सी के मानिन्द हो जायें लेकिन अगर आप से दुश्मनी रखे तो ख़ुदा वंदे आलम उनको आतिशे जहन्नम में डाल देगा। ()

() तारिख़े दमिश्क़ जिल्द 12 पेज 143

अहले बैत (अ) अहले ज़मीन के लिये अमान हैं जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: मेरे अहले बैत अहले ज़मीन के लिये अमान हैं।

क़ारेईने केराम, यह नुक्ता क़ाबिले तवज्जो है कि मुहब्बत एक मोटर की तरह है जो इंसान की की ताक़त को तहरीक करता है ताकि वह महबूब की तरफ़ और उसकी इक़्तेदा में परवाज़ करने के लिये तैयार हो जायें।

इन तमाम मतालिब के पेशे नज़र यह नतीजा हासिल होता है कि जश्न व महफ़िल मुनअक़िद करना अपने महबूब की मुहब्बत के जलवे हैं। क्योकि दूसरी तरफ हम जानते हैं कि लोगों में मुहब्बत के लिहाज़ से मुख़्तलिफ़ दर्जे होते हैं, दूसरी तरफ़ मुहब्बत का असर सिर्फ़ नफ़सियाती नही है बल्कि उसके असरात बाहर की दुनिया में भी दिखाई देते हैं। अलबत्ता उसका बेरुनी असर भी सिर्फ़ महबूब की इताअत और पैरवी में मुनहसिर नही है। (जैसा कि बाज़ लोग कहते हैं) बल्कि उसके लिये दूसरे आसार और जलवे भी होते हैं कि मुहब्बत की दलीलों का इतलाक़ उन सबको शामिल होता है मगर यह कि दूसरी दलीलों से टकराव हो जाये। जैसे महबूब की मुहब्बत में किसी को क़त्ल करना।

इँसान की ज़िन्दगी में मुहब्बत के जलवे कुछ इस तरह होते हैं:

1. इताअत व पैरवी

2. महबूब की ज़ियारत

3. महबूब की ताज़ीम व तकरीम

4. महबूब की ज़रुरतों को पूरा करना

5. महबूब का दिफ़ाअ

6. महबूब के फ़िराक़ में हुज़्न व मलाल जैसे जनाबे याक़ूब (अ) फ़िरोक़े युसुफ़ में ग़म ज़दा थे।

7. महबूब की निशानियों की हिफ़ाज़त

8. महबूब की नस्ल और औलाद का ऐहतेराम

9. महबूब से मुताअल्लिक़ हर चीज़ को बोसा देना

10. महबूब के रोज़े पैदाईश पर जश्न व महफ़िल का मुनअक़िद करना



याद मनाना क़ुरआन की रौशनी में

क़ुरआने मजीद की आयात में ग़ौर व फिक्र करने से मालूम होता है कि किसी चीज़ की याद मनाना उन कामों में से एक है जिसकी ताईद क़ुरआने मजीद ने की है बल्कि उसकी तरफ़ रग़बत दिलाई है:

1.हज से मुतअल्लिक़ आयात से यह नतीजा हासिल होता है कि उनमें से अकसर व बीशतर गुज़श्ता अंबिया व औलिया ए इलाही की याद मनाना है, जिसके चंद नमूने आपकी ख़िदमत में पेश किये जाते हैं:

अलिफ़. मक़ामे इब्रहीम (अ)



आयत

() सूर ए बक़रा आयत 125

और मक़ामें इब्राहीम को मुसल्ला बनाओ।

ख़ुदा वंदे आलम हुक्म फ़रमाता है कि जनाबे इब्राहीम (अ) के क़दमों की जगह को मुतबर्रक मानें और उसको मुसल्ला क़रार दें ताकि जनाबे इब्राहीम (अ) और ख़ान ए काबा की तामीर की याद बाक़ी रहे।

बुख़ारी ने अपनी सही में नक़्ल किया है कि जिस वक़्त ख़ान ए काबा की तामीर के लिये जनाबे इस्माईल (अ) पत्थर उठा कर लाते और जनाबे इब्राहीम (अ) तामीर करते जाते थे यहाँ तक कि इमारत ऊची हो गई तो फिर एक (बड़ा) पत्थर लाया गया और जनाबे इब्राहीम (अ) उस पर खड़ो होकर तामीर करने लगे और इसी तरह उन दोनो ने ख़ान ए काबा की इमारत को मुकम्मल कर दिया। ()

() सही बुख़ारी किताबुल अंबिया जिल्द 2 पेज 158



ब. सफ़ा व मरवा

ख़ुदा वंदे आलम क़ुरआने मजीद में इरशाद फ़रमाता है:

आयत

बेशक सफ़ा व मरवा दोनों पहाड़ियाँ अल्लाह की निशानियों में से हैं लिहाज़ा जो शख़्स भी हज या उमरा करे उस के लिये कोई हरज नही है कि उन दोनो पहाड़ियों का तवाफ़ करे।

ख़ुदा वंदे आलम ने सफ़ा व मरवा के दरमियान सई को हज के अरकान में से क़रार दिया है ताकि सफ़ा व मरवा के दरमियान जनाबे हाजरा की कोशिश की याद ज़िन्दा रहे।

बुख़ारी में नक़्ल हुआ है: जब जनाबे इब्राहीम (अ) ने हाजरा और अपने बेटे इस्माईल को मक्के मे छोड़ दिया और (कुछ मुद्दत बाद) पानी ख़त्म हो गया और दोनो पर प्यास का ग़लबा हुआ, इस्माईल प्यास की शिद्दत की वजह से तड़पने लगे, उस वक़्त जनाबे हाजरा सफ़ा पहाड़ी पर गयीं ताकि अपन बेटे के लिये पानी तलाश करें और वहाँ किसी को देखें और उससे पानी तलब करें लेकिन मायूस होककर सफ़ा से नीचे उतरीं और तेज़ी से मरवा की तरफ़ चलीं, पहाड़ी पर चढ़ी ताकि कोई ऐसा मिल जाये जिससे पानी तलब कर सकें लेकिन वहाँ भी को न मिला, यहाँ तक कि इसी तरह सात बार सफ़ा व मरवा के दरमियान कोशिश की। इब्ने अब्बास पैग़म्बरे अकरम (स) से रिवायत नक़्ल करते हैं कि आपने फ़रमाया: इसी वजह से हज करने वाले सात बार सफ़ा व मरवा के दरमियान सई करते हैं।



जीम. क़ुर्बानी

ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद है:

आयत

() सूर ए साफ़ात आयत 101 से 107

फिर हमने उन्हे एक नेक दिल फ़रजंद की बशारत दी। फिर जब वह फ़रजंद उनके साथ दौड़ धूप करने के क़ाबिल हो गया तो उन्होने कहा: बेटा मैं ख़्वाब में देख रहा हूँ कि मैं तुम्हे ज़िब्ह कर रहा हूँ, अब तुम बताओ कि तुम्हारा क्या ख़्याल है? फ़रंज़ंद ने जवाब दिया कि बाबा जो आपको हुक्म दिया जा रहा है आप उस पर अमल करें, इंशा अल्लाह आप मुझे सब्र करने वालों में से पायेगें। फिर जब दोनो ने सरे तसलीम ख़म कर दिया और बाप ने बेटे को माथे के बल लिटा दिया और हमने आवाज़ दी कि ऐ इब्राहीम तुमने अपने ख़्वाब सच कर दिखाया, हम इसी तरह अमल करने वालों को जज़ा देते हैं। बेशक यह बड़ा खुला हुआ इम्तेहान है और हमने उसका बदला एक अज़ीम क़ुर्बानी को क़रार दिया है।

ख़ुदा वंदे आलम ने उस फ़िदाकारी और क़ुर्बानी की वजह से हाजियों को हुक्म दिया कि मेना के मैदान में हज़रत इब्राहीम (अ) की पैरवी करें और उस अज़ीम अमल और इम्तेहाने बुज़ुर्ग की याद मनाने के लिये गोसफ़ंद ज़िब्ह करें।



द. रमिये जमरात

अहमद बिन हंबल और तियालसी अपनी मुसनद में रसूले ख़ुदा (स) से यूँ रिवायत करते हैं: जब जिबरईल जनाबे इब्राहीम को जमर ए उक़बा की तरफ़ लेकर चले, उस मौक़े पर शैतान उनके पास ज़ाहिर हुआ तो जनाबे इब्राहीम (अ) ने सात पत्थर फेंके कि शैतान की चीख निकल गई, उसके बाद जनाबे इब्राहीम (अ) जमर ए वुसता के पास आये तो वहाँ भी शैतान ज़ाहिर हुआ, आपने सात पत्थर मारे जिससे शैतान की चीख निकल गई, उसके बाद जनाबे इब्राहीम (अ) जमर ए क़सवा के पास आये एक बार फिर शैतान ज़ाहिर हुआ और जनाबे इब्राहीम (अ) ने सात पत्थर मारे यहाँ तक कि शैतान की चीख़ निकल गई। ()

() मुसनदे अहमद जिल्द 1 पेज 306, मुसनदे अत तियालसी हदीस 2697

क़ारेईने केराम, आपने मुशाहेदा फ़रमाया कि ख़ुदा वंदे आलम ने किस तरह इस याद को हाजियों के लिये वाजिब क़रार दिया ताकि इस वाक़ेया की याद को ताज़ा रखें।

2.ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

आयत

() सूर ए हज आयत 32

और यह हमारा फ़ैसला है और जो भी अल्लाह की निशानियों की ताज़ीम करेगा यह ताज़ीम उसके दिल के तक़वे का नतीजा होगी।

इस आय ए शरीफ़ा के ज़रिये इस्तिदलाल यह है कि शआयर शईर की जमा है जिसके मअना निशानी हैं और शआयरे इलाही यानी ख़ुदा और दीन की निशानियाँ, लिहाज़ा हर वह अमल जो लोगों को ख़ुदा और दीन की तरफ़ रहनुमाई करे वह शआयरे इलाही में शामिल है जिनमें से जश्ने ग़दीर का मुन्क़िद करना है जिसमें मोमिनीन, वली ए ख़ुदा (हज़रत अली (अ)) के फ़ज़ायल व कमालात को सुन कर ख़ुदा से नज़दीक होते हैं।

3.ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

आयत

और उन्हे ख़ुदाई दिनों की याद दिलायें।

() सूर इब्राहीम आयत 5

मतलब यह है कि अय्यामुल्लाह बातिल पर हक़ के ग़लबे और हक़ के ज़ाहिर होने के दिन हैं जिनमें से एक रोज़े ग़दीरे है क्योकि उस रोज़ रसूले अकरम (स) ने अपना जानशीन मुअय्यन किया है ताकि आपके अहदाफ़ व मक़ासिद को आगे बढ़ा सकें।

4.ख़ुदा वंदे आलम का इरशाद फ़रमाता है:

आयत

आप कह दिजिये कि मैं तुम से इस तबलीग़े रिसालत का कोई अज्र नही चाहता सिवाए इस के कि मेरे क़राबत दारों से मुहब्बत करो।

() सूर ए शूरा आयत 23

इस तरह हम जश्ने ग़दीर मुनअक़िद करके अजरे रिसालत का एक हिस्सा अदा करते हैं।

5.ख़ुदा वंदे आलम इरशाद फ़रमाता है:

आयत

क़सम है एक पहर चढ़े दिन की और क़सम है रात की जब वह चीज़ों की पर्दापोशी कर ले।

() सूर ए ज़ुहा आयत 1,2

हलबी अपनी किताब सीरये हलबिया में तहरीर करते हैं: ख़ुदा वंदे आलम इस आयत मे पैग़म्बरे अकरम (स) की शबे विलादत की क़सम खाता है। बाज़ लोगों का कहना है कि इससे मुराद शबे असरा है लेकिन दोनो की क़सम मुराद होने में भी कोई हरज नही है।

() सीरये हलबिया जिल्द 1 पेज 58

रौशन है कि किसी चीज़ की क़सम खाना उसकी अहमियत की निशानी है लिहाज़ा क़सम के ज़रिये उसकी याद ज़हनों में ताज़ा की जा सकती है ताकि मोमिनीन उसका ऐहतेराम करें। इसी तरह जश्ने ग़दीर भी है।

6.ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) की नुसरत व मदद और ताज़ीम करने वालों की ताईद के सिलसिले में फ़रमाता है:

आयत

पस जो लोग ईमान लाये उनका ऐहतेराम किया और उनकी इमदाद किया और उनके नूर का इत्तेबा किया जो उनके साथ नाज़िल हुआ है वही दर हक़ीक़त फ़लाह याफ़्ता औक कामयाब हैं।

() सूर ए आराफ़ आयात 157

इस आयत में ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) की नुसरत व मदद और ताज़ीम करने वालों की तारीफ़ करते है और उनको निजात की बशारत देता है लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) के रोज़े विलादत या रोज़े मबअस नीज़ रोज़े ग़दीरे ख़ुम जो आँ हज़रत (स) के जानशीनी का दिन है यह सब आँ हज़रत (स) की ताज़ीम व तकरीम नही तो और क्या है?

7.ख़ुदा वंदे आलम पैग़म्बरे अकरम (स) की शान में इरशाद फ़रमाता है:

आयत

लिहाज़ा जब आप फ़ारिग़ हो जायें तो नस्ब कर दें।

() सूर ए इनशेराह आयत 7

लिहाज़ा जश्ने ग़दीर मनाना लोगों में रसूले अकरम (स) और आपके जानशीन की निसबत लोगों की फ़िक्री सतह में बढ़ावा देना और ख़ुद आँ हज़रत (स) अज़मत को बयान करना है।

लेकिन अगर कोई यह ऐतेराज़ करे कि मज़कूरा आय ए शरीफ़ा के पेशे नज़र आँ हज़रत (स) की नुसरत, ताज़ीम और तकरीम ख़ुदा वंदे आलम से मख़्सूस है तो हम जवाब में अर्ज़ करते है कि ख़ुदा वंदे आलम एक दूसरी जगह पर इरशाद फ़रमाता है:

आयत

और ज़बरदस्त तरीक़े से आपकी मदद करे

() सूर ए फ़तह आयत 3

क्या कोई इस सिलसिले में गुमान करे कि पैग़म्बरे अकरम (स) की नुसरत व मदद अल्लाह से मख़्सूस है और इस सिलसिले में हमारा कोई फ़र्ज़ नही है?

8.इसी तरह ख़ुदा वंदे आलम एक दूसरी जगह इरशाद फऱमाता है:

आयत

और हम गुज़श्ता रसूलों के वाक़ेयात आपसे बयान कर रहे हैं कि उनके ज़रिये आपके दिल को मज़बूत रखें।

() सूर ए हूद आयत 120

इस आयत से यह बात अच्छी तरह से मालूम हो जाती है कि पैग़म्बरे अकरम (स) के लिये गुज़श्ता अंबिया के वाक़ेयात बयान करने की हिकमते आँ हज़रत (स) के दिल को सुकून पहुचाना है ताकि आप मुश्किलात और परेशानियों में साबित क़दम रहें और इसमें कोई शक नही है कि उस जम़ाने में साबित क़दम रहने की कितनी ज़रुरत थी लिहाज़ा इस बात की ज़रुरत है कि मख़्सूस दिनों जैसे रोज़े विलादते आँ हज़रत (स) या रोज़े मबअस या ईदे ग़दीर के मौक़े पर मोमिनीन को एक मुक़द्दस जगह पर जमा किया जाये और उनको उस रोज़ की फ़ज़ीलत से आशना किया जाये, नीज़ पैग़म्बरे अकरम (स) की सीरत उनके सामने बयान की जाये ताकि मोमिनीन के दिलों में दीने इलाही की निस्बत मुहब्बत में इज़ाफ़ा हो।



जश्न और याद मनाना, हदीस की रौशनी में

मुतअद्दिद रिवायात की रौशनी में इस तरह के जश्न और महफ़िल के जवाज़ को साबित किया जा सकता है:

मुस्लिम ने इब्ने क़तादा से नक़्ल किया है कि जब रसूले अकरम (स) से यह सवाल किया गया कि पीर के दिन रोज़ा रखना मुसतहब क्यों हैं? तो आपने फ़रमाया: उसकी वजह यह है कि मैं उस रोज़ पैदा हुआ हूँ और उसी रोज़ मुझ पर क़ुरआने मजीद नाज़िल हुआ है। ()

मुस्लिम इब्ने अब्बास से रिवायत करते है कि जब रसूले अकरम (स) मदीने में वारिद हुए तो देखा कि यहूदी रोज़े आशूरा को रोज़ा रखते हैं, उनसे इस काम की वजह मालूम की गई तो उन्होने कहा: यह वह रोज़ा है जिसमें ख़ुदा वंदे आलम ने बनी इस्राईल को फ़िरऔन पर कामयाबी दी है लिहाज़ा हम उस दिन का ऐहतेराम करते हैं, उस मौक़े रक पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: हम इस अमल के ज़्यादा मुसतहिक़ है। लिहाज़ा आपने हुक्म दिया कि रोज़े आशूर का रोज़ा रखा करें। ()

अल्लामा सुयूती की नक़्ल के मुताबिक़ इब्ने हजर असक़लानी इस हदीस के ज़रिये पैग़म्बरे अकरम (स) के रोज़े विलादत पर जश्न मनाने पर इस्तिदलाल करते हैं। ()

() सही मुस्लिम जिल्द 2 पेज 819

() सही मुस्लिम हदीस 130, सही बुख़ारी जिल्द 7 पेज 215

() अलहावी लिल फ़तावा जिल्द 1 पेज 196

हाफ़िज़ बिन नासिरुद्दीन दमिश्क़ी रिवायत करते हैं: सही तरीक़े से बयान हुआ है कि पीर के रोज़ अबू लहब ने अज़ाब मे कमी हो जाती थी क्योकि उसने पैग़म्बरे अकरम (स) को रोज़े विलादत पर ख़ुश हो कर अपनी कनीज़ सौबिया को आज़ाद कर दिया था। ()

क़ारेई मोहतरम, गुज़श्ता रिवायत के ज़रिये ब तरीक़े औला यह नतीजा हासिल होता है कि आँ हज़रत (स) के रोज़े विलादत पर जश्न मनाना और आँ हज़रत (स) की याद मनाना जायज़ है।

बैहक़ी, अनस बिन मालिक से यूँ रिवायत करते हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपनी नुबूवत के बाद अपने तरफ़ से एक गोसफ़ंद का अक़ीक़ा किया, जबकि रिवायात में भी वारिद हुआ है कि अबू तालिब ने आपकी विलादत के साँतवें दिन आपके अक़ीक़े में एक गोसफ़ंद ज़िब्ह किया था। ()

सुयूती कहते हैं: दूसरी मर्तबा अक़ीक़ा नही किया जा सकता लिहाज़ा पैग़म्बरे अकरम (स) के इस अमल को इस बात पर हम्ल करें कि आँ हजरत (स) ने इस चीज़ का शुक्रिया अदा करते हुए अक़ीक़ा किया कि मैं ख़ुदा वंदे आलम ने उनको ख़ल्क़ फ़रमाया और दोनो आलम के लिये रहमत बना कर भेजा, जैसा कि आँ हज़रत (स) ने ख़ुद अपने ऊपर दुरुद भेजे थे, इसी वजह से मुसतहब है कि हम भी ख़ुदा की बारगाह में शुक्रे इलाही को बजा लाने के लिये आपके रोज़े विलादत पर इजतेमाअ करें, खाना खिलाये और मिठाई तक़सीम करें जिनकी वजह से ख़ुदा की क़ुरबत हासिल होती है। ()

तिरमिज़ी ने पैग़म्बरे अकरम (स) से नक़्ल किया है कि आँ हज़रत (स) ने जुमे के दिन के रोज़े की फ़ज़ीलत के बारे में फ़रमाया: उस रोज़ जनाबे आदम (अ) ख़ल्क़ हुए हैं। ()

() मैरिदुस सादी फ़ी मौलिदिन नबी

() अलहावी जिल्द 1 पेज 196

() अलहावी जिल्द 1 पेज 196

() सही तिरमिज़ी हदीस 491

क़ारिई मोहतरम, इन अहादीस से यह नतीजा हासिल होता है कि बाज़ दिन फ़ज़ीलत रखते हैं जिनमें ख़ास और मुबारक वाक़ेयात पेश आये हैं। लिहाज़ा उस रोज़ की तो बड़ी अहमियत होनी चाहिये जिसमें पैग़म्बरे अकरम (स) पैदा हुए या जिस रोज़ आपने (ग़दीरे ख़ुम) में अपना जानशीन मुअय्यन किया।



जश्न मनाने के फ़वायद

जश्न व महफ़िल मुनअक़िद करने और औलिया ए इलाही की याद मनाने में बहुत सी बरकतें और फ़वायद हैं जिनमें से चंद चीज़ों की तरफ़ इशारा किया जाता है:

इस तरह के जश्न व महफ़िल में मोमिनीन अपने दीन व मज़हब की बुनियाद रखने वालों से दोबारा अहद व पैमान बाँधते हैं कि उनकी राह को आगे बढ़ायेगें और उनके अंदर यह अहसास पैदा होता है कि हमें अपने अज़ीम इमाम और मुक़तदा की राह पर कदम बढ़ाना चाहिये।

उनसे मुहब्बत के इज़हार और बातिनी राब्ते के ज़रिये उन हज़रात के मअनवी फ़ैज़ और बरकतों से बहरा मंद होना।

शिया उन महफ़िलों के ज़रिये दर हक़ीक़त अपने दुश्मनों को पैग़ाम देते है कि हमारे मौला व रहबर अली (अ) हैं। वह ज़ुल्मे सतीज़ और ज़ुल्म का मुक़ाबला करने वाले थे, वह अहकामे इलाही को नाफ़िज़ करने में किसी की रिआयत नही करते थे वग़ैरह वग़ैरह लिहाज़ा हम भी उसी रास्ते पर चलते हैं और उन्ही की पैरवी करते हैं।

हर साल उस रोज़ पैग़म्बरे अकरम (स) और औलिया ए इलाही को याद करके उनकी निस्बत मुहब्बत में इज़ाफ़ा होता है।

इन महफ़िलों में उन हज़रात के बाज़ फ़ज़ायल व कमालात की तौज़ीह व तशरीह की जाती है और मोमिनीन उनकी पैरवी करते हुए ख़ुदा वंदे आलम से नज़दीक होते हैं।

ख़ुशी व मुसर्रत के इज़हार से पैग़म्बरे अकरम (स) और औलिया ए इलाही के ईमान का इज़हार करके उसको मुसतहकम करते हैं।

जश्न व महफ़िल के आख़िर में मिठाई या खाना खिलाने से सवाबे इतआम से बहरा मंद होते हैं और बाज़ ग़रीबों को इस तरह के जश्न से माद्दी फ़ायदा होता है।

इस तरह की महफ़िलों में ख़ुदा की याद ज़िन्दा होती है और क़ुरआनी आयात की तिलावत होती है।

ऐसे मवाक़े पर मोमिनीन पैग़म्बरे अकरम (स) पर बहुत ज़्यादा दुरुद व सलाम भेजते हैं।

ऐसे मवाक़े पर लोगों को ख़ुदा और उसके अहकाम की तरफ़ दावत देने का बेहतरीन मौक़ा होता है।



इस्लाम में ईदे ग़दीर की अहमियत

जिस चीज़ ने वाक़ेया ए ग़दीर के जावेदाना क़रार दिया और उसकी हक़ीक़त को साबित किया है वह उस रोज़ का ईद क़रार पाना है। रोज़े ग़दीर ईद शुमार होती है और उसके शब व रोज़ में इबादत, ख़ुशू व ख़ुज़ू, जश्न और ग़रीबों के साथ नेकी नीज़ ख़ानदान में आमद व रफ़्त होती है और मोमिनीन इस जश्न में अच्छे कपड़े पहनते और ज़ीनत करते हैं।

जब मोमिनीन ऐसे कामों की तरफ़ राग़िब हों तो उनके असबाब की तरफ़ की तरफ़ मुतवज्जेह होकर उसके रावियों की तहक़ीक़ करते हैं और उस वाक़ेया को नक़्ल करते हैं, अशआऱ पढ़ते हैं, जिसकी वजह से हर साल जवान नस्ल की मालूमात में इज़ाफ़ा होता है और हमेशा उस वाक़ेया की सनद और उससे मुताअल्लिक़ अहादीस पढ़ी जाती है, जिसकी बेना पर वह हमेशगी बन जाती हैं। रोज़े ग़दीर से मुतअल्लिक़ दो तरह की बहस की जा सकती है:



शियों से मख़्सूस न होना

यह ईद सिर्फ़ शियों से मख़्सूस नही है। अगर चे उसकी निस्बत शिया ख़ास अहमियत रखते हैं, मुसलमानों के दीगर फ़िरके भी ईदे ग़दीर में शियों के साथ शरीक हैं, ग़ैर शिया उलामा ने भी उस रोज़ की फ़ज़ीलत और पैग़म्बरे अकरम (स) की तरफ़ से हज़रत अली (अ) के मक़ामे विलायत पर फ़ायज़ होने की वजह से ईद क़रार देने के सिलसिले में गुफ़्तुगू की है क्योकि यह दिन हज़रत अली (अ) के चाहने वालों के लिये ख़ुशी व मुसर्रत का दिन है चाहे आपको आँ हज़रत (स) का बिला फ़स्ल ख़लीफ़ा मानते हों या चौथा ख़लीफ़ा।

बैरनी आसारुल बाक़िया में रोज़े ग़दीर को उन दिनों में शुमार करते हैं जिसको मुसलमानों ने ईद क़रार दिया है। ()

इब्ने तलहा शाफ़ेई कहते हैं: हज़रत अमीरुल मोमिनीन (अ) ने अपने अशआर में रोज़े ग़दीरे ख़ुम का ज़िक्र किया है और उस रोज़ को ईद शुमार किया है क्योकि उस रोज़ में रसूले इस्लाम (स) ने आपको अपना जानशीन मंसूब किया और तमाम मख़लूक़ात पर फ़ज़ीलत दी है। ()

() अल आसारुल बाक़िया फ़िल क़ुरुनिल ख़ालिया पेज 334

() मतालिबुस सुऊल पेज 53

नीज़ मौसूफ़ कहते हैं: लफ़्ज़े मौला का जो मअना भी रसूले अकरम (स) के लिये साबित करना मुमकिन हो वही हज़रत अली (अ) के लिये भी मुअय्यन है और यह एक बुलंद मर्तबा, अज़ीम मंज़िलत, बुलंद दर्जा और रफ़ीअ मक़ाम है जो पैग़म्बरे अकरम (स) ने हज़रत अली (अ) से मख़्सूस किया, लिहाज़ा औलिया ए इलाही के नज़दीक यह दिन ईद और मुसर्रत का रोज़ क़रार पाया है। ()

तारिख़ी कुतुब से यह नतीजा हासिल होता है कि उम्मते इस्लामिया मशरिक़ व मग़रिब में उस दिन के ईद होने पर मुत्तफ़िक़ है, मिस्री, मग़रबी और इराक़ी (ईरानी, हिन्दी) उस रोज़ की अज़मत के क़ायल है और उनके नज़दीक रोज़े ग़दीर नमाज़, दुआ, खुतबा और मदह सराई का मुअय्यन दिन है और उस रोज़ के ईद होने पर उन लोगों का इत्तेफ़ाक़ है। ()

इब्ने ख़ल्लक़ान कहत हैं: पैग़म्बरे अकरम (स) हुज्जतुल विदा में मक्के से वापसी में जब ग़दीरे ख़ुम पहुचे, अपने और अली के दरमियान अक़्दे उख़ूवत पढ़ा और उनको अपने लिये मूसा के नज़दीक हारुन की तरह क़रार दिया और फ़रमाया: ख़ुदाया, जो उनकी विलायत को क़बूल करे उसको दोस्त रख और जो उनकी विलायत के तहत न आये और उनसे दुश्मनी करे उसको दुश्मन रख और उनके नासिरों का मदद गार हो जा और उनको ज़लील करने वालों को रुसवा कर दे और शिया उस रोज़ को ख़ास अहमियत देते हैं। ()

मसऊदी ने इब्ने ख़ल्लक़ान की गुफ़्तुगू की ताईद की है, चुँनाचे मौसूफ़ कहते हैं: औलादे अली (अ) और उनके शिया उस रोज़ की याद मनाते हैं। ()

सआलबी, शबे ग़दीर को उम्मते इस्लामिया के नज़दीक मशहूर शबों में शुमार करते हुए कहते हैं: यह वह शब है जिसकी कल में पैग़म्बरे अकरम (स) ने ग़दीरे ख़ुम में ऊटों के कजावों के मिम्बर पर एक ख़ुतबा दिया और फ़रमाया: हदीस

और शियों ने उस शब को मोहतरम शुमार किया है और वह इस रात में इबादत और शब बेदारी करते हैं। ()

() मतालिबुस सुऊल पेज 56

() वफ़यातुल आयान इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पेज 60 व जिल्द 2 पेज 223

() वफ़यातुल आयान इब्ने ख़लक़ान जिल्द 1 पेज 60 व जिल्द 2 पेज 223

() अत तंबीह वल इशराफ़ मसऊदी पेज 221

() सेमारुल क़ुलूब सआलबी पेज 511



ईदे ग़दीर की इब्तेदा

तारीख़ की वरक़ गरदानी से यह मालूम होता है कि इस अज़ीम ईद की इब्तेदा पैग़म्बरे अकरम (स) के ज़माने से हुई है। इसकी शुरुआत उस वक़्त हुईजब पैग़म्बरे अकरम (स) ने ग़दीर के सहरा में ख़ुदा वंदे आलम की जानिब से हज़रत अली (अ) को इमामत व विलायत के लिये मंसूब किया। जिसकी बेना पर उस रोज़ हर मोमिन शाद व मसरुर हो गया और हज़रत अली (अ) के पास आकर मुबारक बाद पेश की। मुबारक बाद पेश करने वालों में उमर व अबू बक्र भी हैं जिनकी तरफ़ पहले इशारा किया जा चुका है और इस वाक़ेया को अहम क़रार देते हुए और उस मुबारक बाद की वजह से हस्सान बिन साबित और क़ैस बिन साद बिन ओबाद ए अंसारी वग़ैरह ने इस वाक़ेया को अपने अशआर में बयान किया है।



ग़दीर के पैग़ामात

उस ज़माने में बाज़ अफ़राद ग़दीर के पैग़मात को इस्लामी मुआशरे में नाफ़िज़ करना चाहते थे। लिहा़ज़ा मुनासिब है कि इस मौज़ू की अच्छी तरह से तहक़ीक़ की जाये कि ग़दीरे ख़ुम के पैग़ामात क्या क्या हैं? क्या उसके पैग़ामात रसूले अकरम (स) की हयाते मुबारक के बाद के ज़माने से मख़्सूस हैं या रोज़े तक उन पर अमल किया जा सकता है? अब हम यहाँ पर ग़दीरे पैग़ाम और नुकात की तरफ़ इशारा करते हैं जिनकी याद दहानी जश्न और महफ़िल के मौक़े पर कराना ज़रुरी है:

हर पैग़म्बर के बाद एक ऐसी मासूम शख़्सियत को होना ज़रुरी है जो उसके रास्ते को आगे बढ़ाये और उसके अग़राज़ व मक़ासिद को लोगों तक पहुचाये और कम से कम दीन व शरीयत के अरकान और मजमूए की पासदारी करे जैसा कि रसूले अकरम (स) ने अपने बाद के लिये जानशीन मुअय्यन किया और हमारे ज़माने में ऐसी शख़्सियत हज़रत इमाम मेहदी अलैहिस्सलाम हैं।

अंबिया (अ) का जानशीन ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ मंसूब होना चाहिये जिनका तआरुफ़ पैग़म्बर के ज़रिये होता है जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने अपने बाद के लिये अपना जानशीन मुअय्यन किया, क्योकि मक़ामे इमामत एक इलाही मंसब है और हर इमाम ख़ुदा वंदे की तरफ़ से ख़ास ता आम तरीक़े से मंसूब होता है।

ग़दीर के पैग़ामात में से एक मसअला रहबरी और उसके सिफ़ात व ख़ुसूसियात का मसअला है, हर कस न नाकस इस्लामी मुआशरे में पैग़म्बरे अकरम (स) का जानशीन नही हो सकता, रहबर हज़रत अली (अ) की तरह हो जो पैग़म्बरे अकरम (स) का रास्ते पर हो और आपके अहकाम व फ़रमान को नाफ़िज़ करे, लेकिन अगर कोई ऐसा न हो तो उसकी बैअत नही करना चाहिये, लिहाज़ा ग़दीर का मसअला इस्लाम के सियासी मसायल के साथ मुत्तहिद है।

चुँनाचे हम यमन में मुलाहिज़ा करते हैं कि चौथी सदी के वसत से जश्ने ग़दीर का मसअला पेश आया और हर साल अज़ीमुश शान तरीक़े पर यह जश्न मुनअक़िद होता रहा और मोमिनीन हर साल उस वाक़ेया की याद ताज़ा करते रहे और नबवी मुआशरे में रहबरी के शरायत से आशना होते रहे, अगरचे चंद साल से हुकूमते वक़्त उस जश्न के अहम फ़वायद और पैग़ामात की बेना पर उसमें आड़े आने लगी, यहाँ तक कि हर साल इस जश्न को मुनअक़िद करने की वजह से चंद लोग क़त्ल हो जाते हैं, लेकिन फिर भी मोमिनीन इस्लामी मुआशरे में इस जश्न की बरकतों और फ़वायद की वजह से इसको मुनअक़िद करने पर मुसम्मम हैं।

ग़दीर का एक हमेशगी पैग़ाम यह है कि पैग़म्बरे अकरम (स) के बाद इस्लामी मुआशरे का रहबर और नमूना हज़रत अली (अ) या उन जैसे आईम्मा ए मासूमीन में से हो। यह हज़रात हम पर विलायत व हाकिमियत रखते हैं, लिहाज़ा हमें चाहिये कि उन हज़रात की विलायत को क़बूल करते हुए उनकी बरकात से फ़ैज़याब हों।

ग़दीर और जश्ने ग़दीर, शिईयत की निशानी है और दर हक़ीक़त ग़दीर का वाक़ेया इस पैग़ाम का ऐलान करता है कि हक़ (हज़रत अली (अ) और आपकी औलाद की महवरियत में है) के साथ अहद व पैमान करें ता कि कामयाबी हासिल हो जाये।

वाक़ेय ए ग़दीर से एक पैग़ाम यह भी मिलता है कि इंसान को हक़ व हकी़क़त के पहचानने के लिये हमेशा कोशिश करना चाहिये और हक़ बयान करने में कोताही से काम नही लेना चाहिये, क्योकि पैग़म्बरे अकरम (स) अगरचे जानते थे कि उनकी वफ़ात के बाद उनकी वसीयत पर अमल नही किया जायेगा, लेकिन लोगों पर हुज्जत तमाम कर दी और किसी भी मौक़े पर मख़ूससन हज्जतुल विदा में हक़ बयान करने में कोताही नही की।

रोज़े क़यामत तक बाक़ी रहने वाला ग़दीर का एक पैग़ाम अहले बैत (अ) की दीनी मरजईयत है, इसी वजह से पैग़म्बरे अकरम (स) ने उन्ही दिनों में हदीस सक़लैन को बयान किया और मुसलमानों को अपने मासूम अहले बैत से शरीयत व दीनी अहकाम हासिल करने की रहनुमाई फ़रमाई।

ग़दीर का एक पैग़ाम यह है कि बाज़ मवाक़े पर मसलहत की ख़ातिर और अहम मसलहत की वजह से मुहिम मसलहत को मनज़र अंदाज़ किया जा सकता है और उसको अहम मसलहत पर क़ुर्बान किया जा सकता है। हज़रत अली (अ) हालाकि ख़ुदा वंदे आलम की तरफ़ से और रसूले अकरम (स) के ज़रिये इस्लामी मुआशरे की रहबरी और मक़ामे ख़िलाफ़त पर मंसूब हो चुके थे, लेकिन जब आपने देखा कि अगर मैं अपना हक़ लेने के लिये उठता हूँ तो क़त्ल व ग़ारत और जंग का बाज़ार गर्म हो जायेगा और यह इस्लाम और मुसलमानों की मसलहत में नही है तो आपने सिर्फ़ वअज़ व नसीहत, इतमामे हुज्जत और अपनी मज़लूमीयत के इज़हार को काफ़ा समझा ताकि इस्लाम महफ़ूज रहे, क्योकि हज़रत अली (अ) अगर उशके अलावा करते जो आपने किया तो फिर इस्लाम और मुसलमानों के लिये एक दर्दनाक हादेसा पेश आता जिसकी तलाफ़ी मुमकिन नही थी, लिहाज़ा यह रोज़ क़यामत तक उम्मते इस्लामिया के लिये एक अज़ीम सबक़ है कि कभी कभी अहम मसलहत के लिये मुहिम मसलहत को छोड़ा जा सकता है।

इकमाले दीन, इतमामे नेमत और हक़ व हक़ीक़त के बयान औप लोगों पर इतमामे हुज्जत करने से ख़ुदा वंदे आलम की रिज़ायत हासिल होती है जैसा कि आय ए शरीफ़ ए इकमाल में इशारा हो चुका है।

तबलीग़ और हक़ के बयान के लिये आम ऐलान किया जाये और छुप कर काम न किया जाये जैसा कि पैग़म्बरे अकरम (स) ने हुज्जतुल विदा में विलायत का ऐलान किया और लोगों के मुतफ़र्रिक़ होने से पहले मला ए आम में विलायत को पहुचा दिया।

ख़िलाफ़त, जानशीनी और उम्मते इस्लामिया की सही रहबरी का मसअला तमाम मासयल में सरे फैररिस्त है और कभी भी इसको तर्क नही करना चाहिये जैसा कि रसूले अकरम (स) हालाकि मदीने में ख़तरनाक बीमारी फैल गई थी और बहुत से लोगों को ज़मीन गीर कर दिया था लेकिन आपने विलायत के पहुचाने की ख़ातिर इस मुश्किल पर तवज्जो नही की और आपने सफ़र का आग़ाज़ किया और इस सफ़र में अपने बाद के लिये जानशीनी और विलायत के मसअले को लोगों के सामने बयान किया।

इस्लामी मुआशरे में सही रहबरी का मसअला रुहे इस्लामी और शरीयत की जान की तरह है कि अगर इस मसअले को बयान न किया जाये तो तो फिर इस्लामी मुआशरे के सुतून दरहम बरहम हो जायेगें, लिहाज़ा ख़ुदा वंदे आलम ने अपने रसूल (स) से ख़िताब करते हुए फ़रमाया:

आयत

और अगर आप ने यह न किया तो गोया उसके पैग़ाम को नही पहुचाया।

() सूर ए मायदा आयत 67



वह्हाबियों के ऐतेराज़ात की तहक़ीक़

आयात, रिवायात और मुसलमानों की सीरत से जश्न व महफ़िल के ज़ायज़ बल्कि रुजहान व मुसतहब होने की दलीलों के बावजूद भी वह्हाबी लोग मुसलमानों के इस अमल का मुक़ाबला करते हैं और बेजा ऐतेराज़ात की बेना पर इस मुक़द्दस अमल में मानेअ होने की कोशिश करते हैं। अब हम यहाँ पर पहले उनके ऐतेराज़ात बयान करते हैं और फिर उनके जवाबात पेश करते हैं:



पहला ऐतेराज़:

किसी की याद मनाने के लिये कोई प्रोग्राम करना ग़ैरे ख़ुदा की इबादत है। ()



जवाब:

यह बात अपनी जगह पर साबित हो चुकी है कि इबादत का उन्सुरे मुक़व्विम (यानी जिस पर इबादत का इतलाक़ किया जाता है) उसकी उलूहीयत या रूबूबीयत का ऐतेक़ाद है जिसकी ताज़ीम की जाये, लिहाज़ा अगर किसी की ताज़ीम व तकरीम उस उन्सुर से ख़ाली हो तो उसको इस्तेलाह में इबादत नही कहा जाता।













दूसरा ऐतेराज़:

इस तरह के प्रोग्राम में ऐसे काम होते हैं जो ग़ालेबन हराम हैं जैसे औरतों और मर्दों का एक साथ जमा होना या मौसीक़ी के साथ नज़्म व क़सीदा पढ़ना। ()



जवाब:

गुनाह किसा भी ज़माने या किसी भी जगह हो हराम है, चाहे किसी प्रोग्राम में हो या उसेक अलावा, लेकिन हम एक ममदूह और पसंदीदा अमल को इस वजह से हराम नही कह सकते कि उसमें कभी कभी कोई गुनाह अंजाम पाता है, बल्कि हमें चाहिये कि हराम और गुनाह से रोक थाम की जाये। ()

() फ़तहुल मजीद बे शरहे अक़ीदतित तौहीद पेज 154,155 हाशिया में

() अल मदख़ल, इब्नुल हाज जिल्द 2 पेज 2

() अलहावी लिलफ़तावा, सुयूती जिल्द 1 पेज 19



तीसरा ऐतेराज़:

पैग़ंम्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: अपने घरों को क़ब्र और मेरी क़ब्र को ईद क़रार न दो। () इब्ने क़य्यिम ने इस हदीस के ज़रिये जश्न व महफ़िल की हुरमत पर इस्तिदलाल किया है। ()



जवाब:

अव्वल. दलील मुद्दआ से ख़ास है क्योकि रिवायत में सिर्फ़ क़ब्रे पैग़म्बर (स) की तरफ़ इशारा हुआ है न कि आम मका़मात की तरफ़।

दूसरे. इस की वजह शायद यह हो कि इँसान पैग़म्बरे अकरम (स) के हुज़ूर में इंसान को ख़ुज़ू व ख़ुशू के आलम में होना चाहिये और यह मसअला पैग़म्बरे अकरम (स) की कब्रे मुनव्वर के पास ख़ुशी व मुसर्रत के साथ हम आहंग नही है लेकिन इस चीज़ से कोई मुमानेअत नही पाई जाती कि दूसरे मक़मात पर भी ख़ुशी व मुसर्रत का इज़हार न किया जाये।

सुबकी कहते हैं: इस हदीस के मअना में यह ऐहतेमाल है कि मेरी कब्र को रोज़ ईद की तरह क़रार न दो बल्कि मेरी कब्र पर ज़ियारत, सलाम व दुआ पढ़ो। ()

() मुसमदे अहमद जिल्द 2 पेज 246

() हाशिय ए औनिल मअबूद जिल्द 6 पेज 32

() कशफ़ुल इरतियाब पेज 449







चौथा ऐतेराज़:

इस तरह के प्रोग्राम में नज़्म व क़सीदा ख़्वानी में ईसाईयों से मुशाबेहत पाई जाती है। ()

() इक़तेज़ाउस सिरात पेज 294

जवाब:

अव्वल. मुशाबेहत का तअल्लुक़ इरादे से है यानी जब इंसान इस शबाहत का क़स्द करता है तब ही उस पर उस मुशाबेहत का हुक्म लागू होता है। अब हम सवाल करते हैं कि क्या कोई मुसलमान इस तरह की महफ़िल में कुफ़्फ़ार और ईसाईयों से शबाहत का क़स्द करता है? हरगिज़ ऐसा नही है।

बुख़ारी अपनी सही किताब मग़ाज़ी में बाब ग़ज़व ए औहद में नक़्ल करते हैं: अबू सुफ़यान ने मुशरेकीन को तहरीत करते हुए यह नारा लगाया: ज़िन्दाबाद बुते हुबल, पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: तुम भी उसका जवाब दो, जवाब दिया हम क्या कहें? तो आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया: तुम कहो .... अबू सुफ़यान ने मुशरेकीन को हमले की तहरीक के लिये दूसरा नारा लगाया: हमारे पास उज़्ज़ा है और तुम्हारे पास उज़्ज़ा नही है। पैग़म्बरे अकरम (स) ने फ़रमाया: तुम भी जवाब दो, असहाब ने अर्ज़ किया हम जवाब में क्या कहें? तो आँ हज़रत (स) ने फ़रमाया कि कहो: .......

() यानी अल्लाह हमारा मौला है लेकिन तुम्हारा कोई मौला नही है।

() सही बुख़ारी हदीस 4043, अल बिदाया वन निहाया जिल्द 4 पेज 28

क्या कोई वह्हाबियों की तरह पैग़म्बरे अकरम (स) से यह कह सकता है कि या रसूलल्लाह, आपका यह अमल काफ़िरों से मुशाबेह है लिहाज़ा जायज़ नही है? क्या ख़ुदा वंदे आलम ने क़ुरआने मजीद में नही फ़रमाया है:

आयत

उसी तरह तुम पर रोज़े लिख दिये गये हैं जिस तरह तुम्हारे से पहले वालों पर लिख दिये गये थे।

() सूर ए बकरह आयत 183

शेख़ शलतूत ने अपनी किताब अल फ़तावा में इस सवाल के जवाब में लिखते है, जिसमें उनसे सवाल किया गया था कि मग़रिबी मुमालिक से आने वाले टोपों का पहनना कैसा है? तो उन्होने जवाब दिया: यह कहना सही नही है कि यह टोपे ग़ैर मुस्लिम और ग़ैर इस्लामी शेआर में से हैं बल्कि उनको मुसलमान व ग़ैर मुसलमान सभी पहनते हैं और जब मुसलमान इस तरह के टोपों को पहनते हैं तो ग़ैर मुसलमानों को दीन से मुशाबेहत का इरादा नही होता बल्कि वह गर्मी या सर्दी से बचने के लिये पहनते हैं। लिहाज़ा उनके पहनने में कोई हरज नही है। ()

() अल फ़तावा, शलतूत पेज 88

दूसरे. किसी अमल के जायज़ होने में क़ुरआने मजीद और सुन्नते रसूल (स) से मुताबिक़त होना मेयार होता है चाहे वह दूसरे से मुशाबेह हो या न हो और हमने जश्न व महफ़िल को ख़ास व आम दलीलों से साबित कर दिया है।

तीसरे. जैसा कि शेख शलतूत के कलाम से मालूम होता है कि ईसाईयों की मुशाबेहत से मक़सूद उनके कामों में मुशाबेहत हैं जैसे सलीब और नाक़ूस बजाना न कि हर अमल में मुशाबेहत मुराद है।



पाचवाँ ऐतेराज़:

सलफ़े सालेह ने इस अमल को अंजाम नही दिया है।



जवाब:

अव्वल, उसूल में यह बात साबित हो चुकी है कि मासूम का कोई काम न करना, उस काम के हराम होने पर दलील नही है, बल्कि सिर्फ़ किसी काम का न करना, उस काम के वाजिब न होने और किसी फ़ेअल का अंजाम देना उसके हराम न होने पर दलालत करता है। लिहाज़ा किसी अमल का सिर्फ़ अंजाम न देना उसके हराम होने पर दलील नही है।

दूसरे, इब्ने तैमिया के ज़माने से पहले मुसलमानों का अमल और सीरत इस तरह की महफ़िल क़ायम करने पर थी और अहले सुन्नत इस बात के क़ायल हैं कि इजमाअ हुज्जत है।

तीसरे, जैसा कि इब्ने तैमिया के कलाम में बयान हुआ है: रसूले अकरम (स) की निस्बत सलफ़े सालेह की मुहब्बत ज़्यादा थी और अगर यह अमल जायज़ होता तो वह भी अंजाम देते, यह कलाम हदीसे नबवी के बर ख़िलाफ़ है क्योकि रसूले अकरम (स) ने अपने असहाब से खिताब करते हुए फ़रमाया है: बेशक अनक़रीब एक ऐसी क़ौम आने वाली है जिनकी मुहब्बत मेरी निस्बत तुम लोगों से ज़्यादा होगी। ()

() मजमउज़ ज़वायद जिल्द 10 पेज 66, क़ंज़ुल उम्माल जिल्द 2 पेज 374

छठा ऐतेराज़:



किसी मख़सूस दिन को ख़ुशी व मुसर्रत से मख़सूस करना बिदअत है।



जवाब:

अव्वल, जैसा कि यह बात साबित हो चुकी है कि कभी कभी कोई मक़ाम, मज़रूफ़ के लिहाज़ से शरफ़ पैदा कर लेता है, इसी तरह ज़माने में बाज़ ज़माने उन मे मख़सूस अमल की वजह से बा अहमियत बन जाते हैं जैसे शबे क़द्र, चुनाचे क़ुरआने मजीद में इरशाद होता है:

आयत

हमने क़ुरआने को एक मुबारक शब में नाज़िल किया है।

लिहाज़ा अगर हम रोज़े विलादते पैग़म्बरे इस्लाम (स) या ईदे ग़दीर के मौक़े पर कोई जश्न मनाते हैं तो इस वजह से कि यह मुबारक शब है।

दूसरे, कभी कभी अहकामे शरीयत किसी आम उनवान के तहत किसी चीज़ से मुतअल्लिक़ होते हैं जिनकी ततबीक़ मुकल्लफ़ के ज़िम्मे होती है जैसे ग़रीबों और फ़क़ीरों की मदद करना एक आम हुक्म है लेकिन उसके मिसदाक़ को मुनतबिक़ करना हमारी ज़िम्मेदारी है कि ग़रीब को किस चीज़ की ज़रूरत है या हम उसको अंजाम दे सकते हैं या नही? यह काम ख़ुद हमारा है। यहाँ भी वक़्त को मुनतबिक़ करना मुकल्लफ़ पर छोड़ा गया है ताकि जब भी मुनासिब वक़्त देखे मुनतबिक़ कर दे।





अल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन, व लहुश शुक्रो अला हाज़न नेअमा

रब्बना तक़ब्बल मिन्ना इन्नका अनतस समीऊल अलीम।

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